
फरीदाबाद , जनतंत्र टुडे / डी.ए.वी. शताब्दी महाविद्यालय, फरीदाबाद के संस्कृत विभाग एवं भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) प्रकोष्ठ द्वारा भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR), नई दिल्ली के सहयोग से एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन हाइब्रिड मोड (ऑफलाइन एवं ऑनलाइन) में किया गया। संगोष्ठी का विषय “भारतीय धर्मबोध की बहुविषयी दार्शनिक पुनर्संरचना: परंपरा, तर्क, नैतिकता एवं समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य” रहा।
इस आयोजन में देश-विदेश के विद्वानों, शिक्षाविदों एवं शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम का आयोजन पद्मश्री डॉ. पूनम सूरी के संरक्षण तथा महाविद्यालय के कार्यवाहक प्राचार्य डॉ. नरेंद्र कुमार के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के संस्कृत एवं पालि विभाग ने ज्ञान-साझेदार के रूप में सहयोग प्रदान किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की वंदना एवं डी.ए.वी. गान के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में पद्मश्री प्रो. हरमोहिंदर सिंह बेदी ने धर्म को तर्कसंगत एवं नैतिक व्यवस्था बताते हुए कहा कि यह आधुनिक समाज को समरसता एवं विकास की दिशा प्रदान करता है। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के प्रो. सुरेन्द्र कुमार ने भारतीय दर्शन के छह दर्शनों के आधार पर धर्म की विभिन्न परिभाषाओं पर प्रकाश डाला।
प्रो. वीरेंद्र अलंकार ने भारतीय जीवन-दर्शन के अनुसार संतुलित एवं शांतिपूर्ण जीवन जीने की आवश्यकता पर बल दिया, वहीं पूर्व भारतीय राजदूत श्री अखिलेश मिश्रा ने आत्मचिंतन एवं भारतीय सांस्कृतिक विविधता के वैश्विक महत्व को रेखांकित किया।
द्वितीय सत्र में डॉ. रवि प्रभात ने भारतीय ज्ञान परंपरा में धर्मबोध के विभिन्न आयामों पर विचार प्रस्तुत किए। मॉरीशस से जुड़े श्री विश्वानन्द पुतिया ने श्रीमद्भगवद्गीता में धर्म की अवधारणा को स्पष्ट किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए जे.एन.यू. के प्रो. सुधीर कुमार आर्य ने महाभारत के उदाहरणों द्वारा दान को सर्वोच्च धर्म बताया।
तृतीय सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय की डॉ. गीतिश निर्बान ने महाभारत के पात्रों के माध्यम से स्त्रीधर्म की व्याख्या की। बाली (इंडोनेशिया) से जुड़े आचार्य विशाल प्रसाद भट्ट ने मनुस्मृति में वर्णित धर्म के दस लक्षणों की आधुनिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी में कुल 7 तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें 118 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। इनमें 94 शोधपत्र ऑनलाइन तथा 24 ऑफलाइन प्रस्तुत किए गए। शोधपत्रों में धर्म के दार्शनिक, नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं समकालीन आयामों पर गहन चर्चा हुई।
समापन सत्र में महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल के पूर्व कुलपति प्रो. आर.सी. भारद्वाज ने धर्म एवं ‘रिलिजन’ के अंतर को स्पष्ट करते हुए धर्म को मानव कल्याण का आधार बताया। प्रो. वीरेंद्र अलंकार एवं श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ. जितेंद्र ढुल एवं संयोजक डॉ. अमित शर्मा ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
यह संगोष्ठी भारतीय धर्मबोध के बहुआयामी स्वरूप को समझने एवं उसकी समकालीन प्रासंगिकता को उजागर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुई।




