फरीदाबाद , जनतंत्र टुडे / थैलेसीमिया से ग्रसित बच्चों को असुरक्षित रक्त चढ़ाए जाने के कारण कई बच्चों में एचआईवी (HIV) एवं हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियाँ होने के मामले सामने आए हैं। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक और पीड़ादायक है। और यह बात केवल थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आशंका है कि असुरक्षित रक्त के कारण न जाने कितने अन्य मरीज भी इसकी चपेट में आए होंगे। यह एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का संकेत है।
थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को जीवनभर नियमित रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है। यदि रक्त की सही तरीके से जाँच (स्क्रीनिंग) न की जाए तो बच्चों के जीवन पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है। वर्तमान में ये बच्चे समाज का हिस्सा हैं, शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और सामान्य जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं। किंतु यदि समाज को यह ज्ञात हो जाए कि उन्हें एचआईवी या हेपेटाइटिस हो गया है, तो सामाजिक बहिष्कार का खतरा उत्पन्न हो सकता है, जिससे उनका जीवन और अधिक कठिन हो जाएगा।
फाउंडेशन अगेंस्ट थैलेसीमिया ने इस गंभीर विषय पर सरकार और संबंधित विभागों को कई बार पत्र लिखकर अवगत कराया है। दुर्भाग्यवश निरीक्षण (इंस्पेक्शन) के नाम पर केवल औपचारिकता पूरी की जा रही है, जबकि जमीनी स्तर पर सख्त कार्रवाई और प्रभावी निगरानी की आवश्यकता है।
संस्था सरकार से निम्नलिखित मांग करती है—
• सभी ब्लड बैंकों में अनिवार्य रूप से अत्याधुनिक जाँच प्रणाली (NAT टेस्ट सहित) लागू की जाए।
• रक्त की गुणवत्ता की नियमित और पारदर्शी निगरानी सुनिश्चित की जाए।
• दोषी पाए जाने वाले ब्लड बैंकों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
• प्रभावित बच्चों एवं अन्य मरीजों के समुचित उपचार और पुनर्वास की जिम्मेदारी सरकार उठाए।
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे पहले ही एक गंभीर बीमारी से संघर्ष कर रहे हैं। असुरक्षित रक्त के कारण उन्हें अन्य घातक बीमारियों का शिकार होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि मानवाधिकार और सामाजिक संवेदनशीलता का प्रश्न भी है।
फाउंडेशन अगेंस्ट थैलेसीमिया समाज, प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से अपील करता है कि इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में किसी भी बच्चे या मरीज का जीवन असुरक्षित रक्त के कारण खतरे में न पड़े।
