
फरीदाबाद , जनतंत्र टुडे / ऑल हरियाणा पावर कारपोरेशनज वर्कर यूनियन के बेनर तले यूनियन कार्यलय में शिक्षा शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर में “संगठन में जनवादी कार्यप्रणाली” विषय पर इलेक्ट्रिसिटी एम्पलाइज फेडरेशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष सुभाष लांबा और “साम्प्रदायिकता और जातिवाद ” विषय पर सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू) हरियाणा के महासचिव जय भगवान ने प्रस्तुत किया। शिक्षा शिविर की अध्यक्षता यूनियन की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य करतार सिंह ने की और संचालन राज्य वरिष्ठ उपाध्यक्ष शब्बीर अहमद गनी ने किया। शिविर में यूनियन के सीसी सदस्य मनोज जाखड़, एनआईटी यूनिट के प्रधान भूप सिंह, सचिव दिगंबर सिंह, ओल्ड यूनिट के सचिव प्रवेश बैंसला, बल्लभगढ़ यूनिट के सचिव वेद प्रकाश कर्दम व वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुरेन्द्र खटकड़ आदि मौजूद थे।
इलेक्ट्रिसिटी एम्पलाइज फेडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुभाष लांबा ने कहा कि संगठन में एकता और ताकत का आधार ‘जनवाद’ है। उन्होंने कहा कि यदि नेतृत्व के किसी व्यवहार से यूनियन का आम सदस्य आहत, उपेक्षित या अपमानित महसूस करता है तो वह गतिविधियों, कार्यक्रमों व आंदोलनों में भाग लेना बंद कर देता है। उन्होंने कहा कि किसी भी यूनियन में केंद्रीयता केवल व्यवस्था बनाए रखने तक स्वीकार्य हो सकती है। उन्होंने कहा कि सभी सदस्यों के साथ समान व उचित व्यवहार, निर्णय लेने की प्रक्रिया में सभी सदस्यों की भागीदारी और पदों पर निर्वाचित होने के समान अवसरों के माध्यम से ‘ जनवाद ‘ की अभिव्यक्ति होती है। उन्होंने निर्वाचित कमेटियों के संचालन में सामूहिक जनवादी कार्यप्रणाली, कमेटियों की कार्यप्रणाली, संगठन में निर्णय लेने और उन्हें लागू करने की प्रक्रिया, निर्णयों व गतिविधियों की समीक्षा, कार्यप्रणाली संबंधी आम भटकाव पर चर्चा करते हुए अनुशासित एवं एकताबद्ध संगठन का निर्माण करने पर बल दिया।
सीटू हरियाणा के महासचिव जयभगवान ने कहा कि साम्प्रदायिकता और जातिवाद मेहनतकशों की एकता तोड़ने का हथियार है। उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिकता धार्मिक या आध्यात्मिक न होकर शुद्ध राजनीतिक है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक उद्देश्य के लिए एक धर्म को मानने वालों को एक अलग समुदाय बताया जाता है,जो दूसरों से न केवल अलग है, बल्कि विपरीत भी है। यह भिन्नता शत्रुतापूर्ण बताई जाती है और ऐसे लोगों को दूसरे के मिटाने पर ही ही अपने समुदाय का हित दिखाई देता है। इसे ठोस रूप में महात्मा गांधी, और मौलाना आजाद तथा सावरकर और जिन्ना के उदाहरण से समझ सकते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार एक तरफ नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को आक्रमकता के साथ लागू करते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को निजी हाथों में सौंप रही है और पूंजीपतियों के लाखों करोड़ रुपए के कर्जों व टैक्सों को माफ कर रही है। इसके खिलाफ पैदा होने वाले आक्रोश को संगठित होने से रोकने के लिए जाति एवं धर्म के आधार पर मेहनतकशों की एकता को तोड़ा जा रहा है। उन्होंने एकता एवं संधर्ष के नारे को बुलंद किया।





