फरीदाबाद,जनतंत्र टुडे
अग्रवाल महाविद्यालय के इतिहास विभाग द्वारा एक अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान का आयोजन अग्रवाल महाविद्यालय के प्राचार्य डॉo कृष्ण कांत गुप्ता जी की सद्प्रेरणा से हुआ। अतिथि व्याख्यान का विषय-“बाबासाहेब अम्बेडकर थॉट्स ऑन रिप्रेजेंटेशन एंड हिज कंट्रीब्यूशन टू डेमोक्रेसी डयूरिंग नेशनल मूवमेंट” रहा। मुख्य वक्ता के रूप में डॉo नेत्रपाल सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, मोतीलाल नेहरु कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ने बेहद ज्ञानवर्धक व सारगर्भित वक्तव्य दिया। इस अतिथि व्याख्यान में महाविद्यालय के इतिहास भाग के अनेक छात्र- छात्राओं ने भाग लिया। अतिथि व्याख्यान का आरंभ सरस्वती वन्दना से हुआ । सर्वप्रथम अग्रवाल महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ० कृष्ण कांत गुप्ता जी ने मुख्य वक्ता का स्वागत करते हुए, शुभकामनाएं दी
व कहा कि डॉ० भीमराव अंबेडकर का नाम आते ही भारतीय संविधान का जिक्र अपने आप आ जाता है, सारी दुनिया आमतौर पर उन्हें या तो भारतीय संविधान के निर्माण में अहम भूमिका के नाते याद करती है या फिर भेदभाव वाली जाति व्यवस्था की प्रखर आलोचना करने और सामाजिक गैरबराबरी के खिलाफ आवाज उठाने वाले योद्धा के तौर पर, इन दोनों ही रूपों में डॉ० अंबेडकर की बेमिसाल भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता है। तत्पश्चा्त इतिहास विभागाध्यक्ष व अतिथि व्याख्यान के संयोजक डॉ जयपाल सिंह ने विद्यार्थियों को मुख्य वक्ता डॉ० नेत्रपाल सिंह का परिचय दिया। मुख्य वक्ता डॉ नेत्रपाल सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि बाबासाहेब अम्बेडकर ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में लोकतंत्र की नींव मजबूत कर, सदियों पुरानी अनेक रूढ़िवादी अन्यायपूर्ण परम्पराओं को तोड़ने का साहस किया
और सामाजिक न्याय के ढांचे को मजबूती दी। वर्ष 1936 में डॉ. अंबेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की। 14 अक्तूबर, 1956 को उन्होंने अपने कई अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया। उसी वर्ष उन्होंने अपना अंतिम लेखन कार्य ‘बुद्ध एंड हिज धर्म’ पूरा किया। डॉ. अंबेडकर ने दलितों के मध्य शिक्षा और संस्कृति के प्रसार के लिए कई आंदोलन और संगठन बनाए और 1932 में महात्मा गांधी जी के साथ ऐतिहासिक पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए जिसके फलस्वरूप पृथक निर्वाचन मंडल के विचार को त्याग कर दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रांतीय विधानमंडलों में 71 से बढ़ाकर 147 तथा केंद्रीय विधानमंडल में कुल सीटों का 18% कर दी गई। उन्होंने राष्ट्र के निर्माण में देश को शिक्षा,
स्वास्थ्य, स्वच्छता और संघर्ष के मुद्दों पर चिंतन करने का मार्ग प्रशस्त किया तथा जीवन में शिक्षा और संघर्ष के माध्यम से बड़ी- बड़ी चुनौतियों को हल किया। भारत मां के इस वीर सपूत को भारत सहित विश्वभर में सामाजिक न्याय के पैरोकार के रूप में याद किया जाता है और इसलिए वर्ष 1990 में भारत सरकार ने डॉ. बी. आर. अंबेडकर को भारत रत्न पुरस्कार से नवाजा। अंत में विद्यार्थियों ने व्याख्यान के विषय से जुड़े अनेक प्रश्न पूछे , सभी जिज्ञासाओं का मुख्य वक्ता ने समाधान किया । इतिहास विभाग की डॉ० सुप्रिया ढांडा ने मंच संचालन किया । अतिथि व्याख्यान मुख्य वक्ता के धन्यवाद ज्ञापन से समाप्त हुआ।
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