
फरीदाबाद , जनतंत्र टुडे / जे.सी. बोस विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय,वाईएमसीए के संचार एवं मीडिया प्रौद्योगिकी विभाग में आज ‘डीपफेक और फैक्ट-चेकिंग” विषय पर एक विशेष मास्टर क्लास का आयोजन किया गया। यह सत्र पीटीआई एजेंसी के चीफ सब एडिटर गौरव ललित शर्मा द्वारा संचालित किया गया। उन्होंने छात्रों को डिजिटल युग में फैल रही फेक न्यूज़, डीपफेक वीडियो और मिस इंफॉर्मेशन की पहचान और सत्यापन के व्यावहारिक पहलुओं से अवगत कराया।
मीडिया विभागाध्यक्ष प्रो.पवन सिंह ने विशेषज्ञ गौरव ललित शर्मा का स्वागत कर उन्हें स्मृति स्वरूप पुस्तक भेंट की। उन्होंने कहा कि ऐसी मास्टरक्लास जिम्मेदार मीडिया पेशेवर तैयार करने में सहायक हैं और आज के दौर में एआई, फेक न्यूज व डीपफेक जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए तकनीकी दक्षता और नैतिक पत्रकारिता दोनों जरूरी हैं।
विशेषज्ञ गौरव ललित शर्मा ने मास्टर क्लास में बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में डीपफेक कंटेंट तेजी से बढ़ रहा है। पत्रकारों के लिए अब केवल खबर लिखना ही नहीं बल्कि खबर की सत्यता की जांच करना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। उन्होंने मीडिया विद्यार्थियों को डीपफेक पहचानने और भ्रम दूर करने के लिए कई अत्याधुनिक टूल्स से परिचित कराया।
जिसमें मुख्य रूप से शामिल रहे :
हाइव मॉडरेशन : एआई आधारित इमेज और वीडियो मॉडरेशन टूल, जो डीपफेक कंटेंट को पहचानने में मदद करता है।
साइट इंजन : कंटेंट एनालिसिस टूल जो फोटो और वीडियो में मैनिपुलेशन ट्रेस करता है।
डीपवेयर स्कैनर : डीपफेक वीडियो का विश्लेषण कर उसकी ऑथेंटिसिटी की जाँच करता है।
इनवीड वीवेरिफ़ाई : वीडियो और इमेज फैक्ट-चेकिंग के लिए पत्रकारों का पसंदीदा टूल।
फोरेंसेकाली : इमेज मेटाडेटा और एडिटिंग ट्रेसेज़ पहचानने के लिए मुफ़्त ऑनलाइन टूल।
गूगल लेंस और टीनआई : रिवर्स इमेज सर्च के ज़रिए फेक विजुअल्स की सच्चाई तक पहुँचने के उपयोगी माध्यम।
टेक्नोलॉजी पत्रकारिता के लिए खतरा नहीं है, बल्कि यह सत्य की खोज में सबसे बड़ी सहयोगी बन सकती है। बशर्ते हम इसे जिम्मेदारी से इस्तेमाल करें। सत्र के दौरान विद्यार्थियों ने फैक्ट-चेकिंग की प्रक्रिया, डिजिटल एथिक्स और सोशल मीडिया वेरिफिकेशन से जुड़े कई सवाल पूछे। कोऑर्डिनेटर अनिरुद्ध ने धन्यवाद व्यक्त किया






