
फरीदाबाद,जनतंत्र टुडे
अग्रवाल महाविद्यालय बल्लमगढ़ के इतिहास विभाग द्वारा भारतीय समाज में समग्र संस्कृति की ऐतिहासिकता विषय पर एक-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन प्राचार्य डॉ. कृष्णकांत गुप्ता जी के कुशल मार्गदर्शन व नेतृत्व में किया गया। इस संगोष्ठी को निदेशक उच्च शिक्षा हरियाणा द्वारा अनुमोदित किया गया था। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. कृष्णकांत गुप्ता ने की। कार्यक्रम का प्रारंभ दीपशिखा प्रज्वलन एवं पौधा भेंटकर अतिथियों के सत्कार के साथ हुआ। महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. कृष्णकांत गुप्ता जी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह संगोष्ठी एक मंच प्रदान करेगी और इतिहासविदों, शोधकर्ताओं और छात्रों के बीच बातचीत समक्ष करेगी।
संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय संस्कृति की महत्वता और चुनौतियों पर गंभीर मंथन व चिंतन कर इसके विभिन्न पक्षों व धाराओं पर चर्चा कर भविष्य में आने वाली बांधाओ से सुरक्षित करना रहा। उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय इतिहास विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर के.एल. टूटेजा जी रहे। जिन्होंने अपने संबोधन में कहा कि समकालीन समय में इतिहास, भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता और हमें इतिहास का अध्ययन क्यों और कैसे करना चाहिए, वीज वक्ता डॉ. प्रियतोष शर्मा, अध्यक्ष इतिहास विभाग पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ ऑनलाइन माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने “हिंदुस्तान (भारत)‘ के निर्माण में सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिमान ‘एक अवलोकन’ विषय पर ऑनलाइन मोड में बात की, जिसमें उन्होंने तिहासिक कालखंडों और हर चीज पर सवाल उठाने के विचार का पता लगाया और यह भी कहा कि ईश्वर की अंतिमता तय नहीं थी।
मिश्रित संस्कृति को समझने के लिए, उन्होंने महसूस किया कि कोई भी ग्रंथों का उल्लेख कर सकता है जिसे अंतिम व्याख्या के स्रोत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि मठों की अवधारणा और मेलों और सामाजिक समारोहों के विचार के रूप में भी देखा जाना चाहिए। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. जगदीश प्रसाद, सहायक निदेशक हरियाणा अकेडमी ऑफ हिस्ट्री एंड कल्चर, कुरुक्षेत्र ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। संगोष्ठी की विषय वस्तु और उद्देश्यों को संगोष्ठी के संयोजक व इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. जयपाल सिंह ने प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारतीय संस्कृति एक बहती हुई शक्तिशाली नदी की तरह है जो विभिन्न युगों में बदलती हुई वर्तमान युग में एकरूपता और सद्भावना का प्रतिबिम्ब रही है। विभिन्न विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों के विशेषज्ञों इतिहासविदों और शिक्षाविदों की उपस्थिति में उद्घाटन समारोह संपन्न हुआ।
प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. महेंद्र सिंह एसोसिएट प्रोफेसर, दयानंद महाविद्यालय, हिसार ने की और आमंत्रित वार्ता डॉ. मनमोहन शर्मा सेवानिवृत्त प्रोफेशन, इतिहास विभाग बाबा मस्तनाथ यूनिवर्सिटी, रोहतक। उन्होंने विस्तार से बताया कि उन्होंने “प्राचीन भारत में समकालिक मूर्तियां और समग्र संस्कृति” विषय पर बात की, जिसमें उन्होंने भारत के कई हिस्सों में पाई जाने वाली विभिन्न मूर्तियों और पूरे भारत में प्रचलित संस्कृतियों का हवाला दिया, जिनके भौगोलिक क्षेत्र, धर्म, समय के बावजूद बहुत सारे पहलू समान हैं। . उन्होंने यह भी विस्तार से बताया कि कैसे नई सौंदर्य संबंधी संवेदनाओं ने राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में नए रूपों को पेश किया है। फिर भी, एक सांस्कृतिक एकत्रीकरण बना रहता है जिसका समय-समय पर अध्ययन किया जा सकता है।
अगले तकनीकी सत्र में अध्यक्ष प्रोफेसर मनमोहन शर्मा, पूर्व प्रोफेसर, इतिहास विभाग, बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय, रोहतक थेऔर आमंत्रित वक्ता डॉ. महेंद्र सिंह रहे। उनका विषय “हरियाणा में 1857: सांझी शहादत, सांझी विरासत” रहा, जिसमें उन्होंने 1857 के विद्रोह और इसमें हरियाणा के लोगों द्वारा निभाई गई भूमिका के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि हरियाणवियों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक प्रमुख भूमिका निभाई और अहिरवाल में राव तुला राम, पलवल में गफ्फूर अली, हरसुख राय, फरीदाबाद में धनु सिंह, बल्लभगढ़ में नाहर सिंह और कई अन्य नामों का हवाला दिया। दोनों तकनीकी सत्रों के दौरान मौखिक प्रस्तुति भी हुई। समापन सत्र में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. कृष्णकांत गुप्ता अध्यक्ष रहे और प्रोफ़ेसर जय वीर सिंह धनखड़ विभागाध्यक्ष इतिहास विभाग महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक मुख्य अतिथि रहे। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा की कैसे कई संस्कृतियों का विषम मिश्रण अंततः भारतीय क्षेत्र में समग्र संस्कृतियों के उदय का कारण बनता है।
विशिष्ट अतिथि श्रीमती सुषमा स्वराज कन्या महाविद्यालय बल्लभगढ़ के प्राचार्य श्री राजपाल रहे। समापन उद्बोधन डॉ. सूरजभान भारद्वाज पूर्व प्राचार्य मोतीलाल नेहरू कॉलेज, नई दिल्ली द्वारा दिया गया। उन्होंने संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने इस तरह के सार्थक सम्मेलनों के आयोजन के लिए कॉलेज के प्रयासों की सराहना की और भारतीय संस्कृति के विकास के बारे में बताया। उन्होंने महसूस किया कि समग्र संस्कृति नए विचारों, शैलियों और रूपों के समावेश के साथ उत्कृष्टता की निरंतरता है। कुल मिलाकर, सम्मेलन में पूरे भारत के प्रतिभागियों ने भौतिक और ऑनलाइन दोनों मोड में भाग लिया। संगोष्ठी का सार सुश्री उदिता कुंडू द्वारा प्रस्तुत किया गया। संगोष्ठी में भारत के विभिन्न राज्य और त्रों से आए हुए प्रतिभागियों ने अपनी सक्रिय प्रतिभागीदारिता निभाई और अपने शोध पत्रों का प्रस्तुतीकरण किया।
संगोष्ठी में अन्य विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से आए हुए प्रवक्ता एवं विद्यार्थियों ने संस्तुति एवं फीडबैक भी दिए। धन्यवाद ज्ञापन और मंच संचालन संगोष्ठी की आयोजन सचिव डॉ. सुप्रिया ढांडा द्वारा किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गान के साथ हुआ। कार्यक्रम को सफल बनाने में संगोष्ठी के सहायक संयोजक डॉ. रामचंद्र, डॉ. नरेश कामरा, श्रीमती पूजा, श्री सुभाष व श्री लवकेश का विशेष योगदान रहा। सम्मेलन में लगभग 97 प्रतिभागियों ने भाग लिया।







