
फरीदाबाद , जनतंत्र टुडे / जे.सी. बोस विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, वाईएमसीए, फरीदाबाद के साहित्य एवं भाषा विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘ट्रांसमीडिया स्टोरीटेलिंग: नैरेटिव्स, डिस्कोर्स एंड डिसेमिनेशन’ (टीएस-26) का शुभारंभ आज विश्वविद्यालय सभागार में हुआ। यह सम्मेलन हाइब्रिड मोड में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें देश-विदेश के विद्वान ऑफलाइन एवं ऑनलाइन माध्यम से सहभागी बने।
उद्घाटन सत्र में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. भीम सिंह दहिया मुख्य अतिथि रहे तथा सम्मेलन को अत्यंत नवाचारी बताते हुए इसे समकालीन शैक्षणिक विमर्श की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया। सत्र में मुख्य वक्ता प्रो. मार्गिट कोवेस (विजिटिंग प्रोफेसर, विभाग– स्लावोनिक एवं फिनो-उग्रियन स्टडीज, दिल्ली विश्वविद्यालय) रहीं, जबकि अध्यक्षीय सम्बोधन प्रो. प्रसन्नांशु (निदेशक, सेंटर फॉर लिंग्विस्टिक जस्टिस एंड एंडेंजर्ड लैंग्वेजेस, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, द्वारका) ने दिया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजीव कुमार ने सम्मेलन को एक विशिष्ट अकादमिक पहल बताते हुए विभाग के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि वैश्विक सहभागिता वाला हाइब्रिड सम्मेलन विश्वविद्यालय की अकादमिक प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है।
सम्मेलन की मुख्य वक्ता प्रो. मार्गिट कोवेस ने अपने व्याख्यान में लास्ज़लो क्रास्नाहोर्काई के साहित्यिक कार्यों की गहन समीक्षा प्रस्तुत की। उन्होंने ‘सातांतांगो’, ‘द मेलन्कॉली ऑफ रेसिस्टेंस’, ‘द ट्यूरिन हॉर्स’ तथा ‘वार एंड वार’ जैसी कृतियों के माध्यम से साहित्य, सिनेमा और दर्शन के बीच संवाद की जटिल संरचना को स्पष्ट किया।
सत्र को सम्बोधित करते हुए कुलसचिव प्रो. अजय रँगा ने ट्रांसमीडिया स्टोरीटेलिंग के सामाजिक और कानूनी पहलुओं पर महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि ट्रांसमीडिया कैसे कहानियों के माध्यम से समाज को नया रूप देती है। जनमत को प्रभावित करती है और सामाजिक रुझानों को बढ़ावा देती है। यह विभिन्न मैंडेट्स जैसे नीतियां, नैतिकता और सांस्कृतिक मानदंड पर असर डालते हैं।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. प्रसन्नांशु ने ट्रांसमीडिया स्टोरीटेलिंग को डिजिटल युग में एक परिवर्तनकारी कथात्मक अभ्यास बताया। उन्होंने साहित्य, मीडिया, संस्कृति और तकनीक के अंतर्संबंधों पर बल देते हुए अंतर्विषयक संवाद की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने विविध वैश्विक दृष्टिकोणों और उभरते मीडिया परिदृश्य में सहयोगात्मक शैक्षणिक सहभागिता का आह्वान किया।
प्लेनरी सत्र में प्रो. डेविड ब्लूमेनक्रांत्ज़ (कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, यूएसए) ने ‘रिक्लेमिंग एजेंसी’ विषय पर अपने विचार रखते हुए बताया कि किस प्रकार फोटोग्राफी उपनिवेशवादी दृष्टिकोण, पश्चिमी मीडिया संरचनाओं और मानवीय कथाओं के माध्यम से सत्ता संरचनाओं को प्रभावित करती रही है। उन्होंने ‘विज़ुअल इम्पीरियलिज़्म’, ‘इम्पीरियल गेज’ तथा ‘फोटोग्राफिक ट्रुथ’ जैसे अवधारणाओं की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए यह रेखांकित किया कि छवियाँ किस प्रकार अर्थ का निर्माण करती हैं और कैसे फोटोग्राफी को सम्मान, संदर्भ और प्रतिनिधित्व की पुनर्स्थापना के माध्यम के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
प्रो. अहमर महबूब (यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी, ऑस्ट्रेलिया) ने द एम्पलीफायर जर्नल की ट्रांसमीडिया और सबाल्टर्न प्रैक्टिस विषय पर बोलते हुए कहा कि किस प्रकार ट्रांसमीडिया प्लेटफॉर्म हाशिये की आवाज़ों को ज्ञान, पहचान और प्रतिरोध के लिए एक सशक्त मंच प्रदान करते हैं। उन्होंने डिजिटल स्टोरीटेलिंग और बहु-माध्यमीय शोध को अधिक समावेशी और सहभागी बौद्धिक संरचना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। सत्र को प्रो. निबिर के. घोष (यूजीसी एमेरिटस प्रोफेसर, आगरा कॉलेज, आगरा) ने भी सम्बोधित किया। सम्मेलन के पहले दिन हाइब्रिड मोड में कुल 40 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
सम्मेलन का मुख्य आकर्षण फोटो प्रदर्शनी और लोकगायन “झूलना” की सांस्कृतिक प्रस्तुति रही, जिसने अकादमिक विमर्श को सांस्कृतिक संवेदनशीलता और भारतीय लोक परंपरा से जोड़ा। इस प्रस्तुति ने सम्मेलन के बौद्धिक वातावरण को एक भावनात्मक एवं सांस्कृतिक आयाम प्रदान किया।
