
फरीदाबाद , जनतंत्र टुडे / 39 वां सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर महोत्सव 15 फरवरी (रविवार) को भव्य एवं गरिमामय समापन समारोह के साथ संपन्न होगा। विश्व प्रसिद्ध सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला के इस समापन अवसर पर हरियाणा के माननीय राज्यपाल प्रोफेसर आशिम कुमार घोष मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएंगे।
पर्यटन निगम हरियाणा एवं मेला प्रशासन द्वारा समापन समारोह के सफल आयोजन हेतु सभी आवश्यक तैयारियां पूर्ण कर ली गई हैं। आयोजन स्थल सूरजकुंड पर सुरक्षा, यातायात प्रबंधन, अतिथि सत्कार, मंच संचालन तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के सुव्यवस्थित संचालन के लिए व्यापक स्तर पर व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं।
15 फरवरी को दोपहर 3 बजे आयोजित होने वाले इस भव्य समापन समारोह में देश-विदेश से आए शिल्पकारों, हस्तशिल्प विशेषज्ञों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान पारंपरिक शिल्प, लोक कलाओं के संरक्षण तथा आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को सशक्त बनाने में उनके विशिष्ट योगदान के प्रति कृतज्ञता स्वरूप प्रदान किया जाएगा। मेले में आत्मनिर्भर भारत की थीम के तहत स्वदेशी उत्पादों के साथ अंतरराष्ट्रीय सहभागिता भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। विशेष रूप से अफगानिस्तान के ड्राई फ्रूट और उत्तर प्रदेश के हाथरस की प्रसिद्ध हींग पर्यटकों की पसंद बनी हुई है।
मेला परिसर में अफगानिस्तान के स्टॉल पर बादाम, पिस्ता, अखरोट, काजू, किशमिश, अंजीर और मिक्स ड्राई फ्रूट की अनेक उच्च गुणवत्ता वाली किस्में उपलब्ध हैं। प्राकृतिक ये मेवे स्वाद और पोषण से भरपूर हैं। इनकी स्टॉल संचालकों ने बताया कि शुद्धता और गुणवत्ता के चलते ये उत्पाद पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। सूखे मेवे न केवल स्वादिष्ट होते हैं, बल्कि ऊर्जा, प्रोटीन और आवश्यक विटामिन से भरपूर होने के कारण स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माने जाते हैं। इसी तरह हाथरस की हींग भी सूरजकुंड मेला परिसर मेले में खास आकर्षण का केंद्र है। सब्जियों और दालों में तडक़ा लगाते समय थोड़ी सी हींग स्वाद को कई गुना बढ़ा देती है। संचालकों ने बताया कि आयुर्वेदिक गुणों से युक्त हींग पाचन तंत्र के लिए लाभकारी मानी जाती है और गैस व अपच जैसी समस्याओं में सहायक होती है। स्टॉल संचालकों ने बताया कि शुद्ध और देसी हींग की मांग लगातार बढ़ रही है।
शिल्प मेला का आयोजन इस समय अपने भव्य समापन की ओर तेजी से अग्रसर है और जैसे-जैसे अंतिम दिन नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे मेले की रौनक और जन-उत्साह नई ऊंचाइयों को छू रहा है। शनिवार को मेले में दर्शकों की अभूतपूर्व भीड़ उमड़ी, जिसने इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन की लोकप्रियता और विश्वसनीयता को एक बार फिर सिद्ध कर दिया। दिनभर मेले परिसर में उत्सव जैसा माहौल बना रहा और दर्शकों की आवाजाही का आंकड़ा तीन लाख के पार पहुंच गया, जो इस बात का प्रमाण है कि सूरजकुंड मेला आज भी जनमानस के दिलों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि विदेशों से आए शिल्पकारों द्वारा प्रस्तुत की गई हस्तशिल्प कृतियां, पारंपरिक कलाकृतियां और अनूठे उत्पाद दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बने रहे। मिट्टी, धातु, लकड़ी, कपड़े, बांस और पत्थर से बनी कलाकृतियों में शिल्पकारों की मेहनत, कल्पनाशीलता और सांस्कृतिक विरासत की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई दी। पर्यटकों ने न केवल इन उत्कृष्ट उत्पादों की खरीदारी कर आत्मनिर्भर भारत की भावना को सशक्त किया, बल्कि विभिन्न राज्यों की लोकसंस्कृति, परंपराओं और जीवनशैली को भी नजदीक से देखने और समझने का अवसर प्राप्त किया।
मेले की मुख्य चौपाल पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने पूरे वातावरण को और भी रंगीन व जीवंत बना दिया। देश के विभिन्न राज्यों से आए लोक कलाकारों ने अपनी पारंपरिक नृत्य एवं संगीत प्रस्तुतियों के माध्यम से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। ढोल-नगाड़ों की गूंज, लोकगीतों की मधुर धुनें और रंग-बिरंगे परिधानों में सजे कलाकारों की प्रस्तुतियों पर दर्शक झूम उठे। वहीं, विदेशी कलाकारों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने भी अंतरराष्ट्रीय सौहार्द और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सुंदर संदेश दिया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा और तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया।
परिवार सहित मेले में पहुंचे पर्यटकों के लिए यहां मनोरंजन, खरीदारी और स्वाद—तीनों का भरपूर संगम देखने को मिला। मेले में स्थापित फूड कोर्ट में देश के विभिन्न राज्यों के पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू पूरे परिसर में फैली रही। राजस्थान के दाल-बाटी-चूरमा से लेकर दक्षिण भारत के डोसा-इडली, उत्तर भारत के छोले-भटूरे और पूर्वोत्तर भारत के विशेष व्यंजनों तक, हर स्वाद के लिए कुछ न कुछ उपलब्ध रहा। पर्यटकों ने न केवल इन व्यंजनों का आनंद लिया, बल्कि अपने परिवार और मित्रों के साथ बिताए गए इन यादगार पलों को कैमरों में कैद कर स्मृतियों का हिस्सा बनाया।
मेले में तैनात सुरक्षा कर्मियों, स्वयंसेवकों और प्रशासनिक अधिकारियों की सक्रिय भूमिका ने यह सुनिश्चित किया कि प्रत्येक आगंतुक सुरक्षित और सहज वातावरण में मेले का आनंद उठा सके। स्वच्छता अभियान के अंतर्गत नियमित सफाई, कचरा प्रबंधन और स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता पर विशेष ध्यान दिया गया, जिससे मेला परिसर स्वच्छ और सुव्यवस्थित बना रहा।
जैसे-जैसे यह ऐतिहासिक मेला अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे दर्शकों का उत्साह और उमंग और भी बढ़ती नजर आ रही है। लोग न केवल दोबारा मेले में आने की इच्छा जता रहे हैं, बल्कि अपने परिचितों और मित्रों को भी इस सांस्कृतिक महोत्सव का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। रविवार को समापन तक यह मेला एक बार फिर अपनी भव्यता, सांस्कृतिक विविधता और लोकप्रियता की मिसाल कायम करेगा।
निस्संदेह, सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला न केवल शिल्पकारों को एक वैश्विक मंच प्रदान कर रहा है, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, आत्मनिर्भरता और एकता में विविधता के संदेश को भी देश-विदेश तक प्रभावी ढंग से पहुंचा रहा है।
